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ktaa maaanav jati khatam ho rahi hai???

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Announcement ktaa maaanav jati khatam ho rahi hai???

Post by manjeet kaur on Thu Oct 09, 2014 9:05 pm

क्या मानव जाति विलुप्त होने की कगार
पर है? वैज्ञानिकों की चिंताएँ
बढ़ती जा रही हैं और साथ में शोध
की गति भी। जब से इस सृष्टि में
प्राणियों ने जन्म लेना प्रारम्भ किया है
तब से अभी तक प्राणियों की चालीस
प्रतिशत से अधिक प्रजातियाँ लुप्त
हो चुकी हैं और कई लुप्तप्राय हैं।
वैज्ञानिकों को इसमें तो संदेह
नहीं कि मानव जाति भी विलुप्त
होगी केवल काल के बारे में अनुमान अलग-अलग
हैं। कुछ वैज्ञानिक 100 वर्षों से
ज्यादा का समय नहीं देते तो कुछ लम्बा समय
देते हैं।
विलुप्त प्रजातियों में सर्वाधिक रहस्यमय
डायनासोर का लुप्त होना है। इतने
भीमकाय और शक्तिशाली प्राणी के
रहस्यमय रीति से लुप्त हो जाने
की घटना को स्पष्ट करने के लिए कई वाद
प्रचलित हैं। सर्वाधिक सम्मत वाद के अनुसार
साढ़े छह करोड़ वर्ष पूर्व कोई धूमकेतु
या अंतरिक्ष में भटकती विशाल चट्टान जब
तीव्र गति से पृथ्वी से टकराई तो धूल के
गुबार ने सारी पृथ्वी को ढक लिया।
सूर्य की रोशनी कई वर्षों तक पृथ्वी पर
नहीं पहुँच सकी और इसी वजह से अत्यधिक कम
तापमान होने से पृथ्वी डायनासोर
विहीन हो गई। अन्य कारणों में पृथ्वी पर
बार-बार हिमयुग का आना, विशाल
ज्वालामुखी का फटना, जलवायु में निरंतर
परिवर्तन होना, संक्रामक रोग का फैलना,
डायनासोर की जनसंख्या का विस्फोट
होना इत्यादि। करोड़ों वर्षों के पश्चात
भी डायनासोर के कंकाल और अवशेष पृथ्वी के
विभिन्न हिस्सों में पाए जाते हैं और इसलिए
शोधकर्ताओं को शोध के लिए
आसानी होती है, किन्तु वे अभी तक कोई
प्रामाणिक कारण नहीं दे पाये हैं इस
रहस्यमय तरीके से परिमृति या विलुप्त
हो जाने का।
एक ओर वह (डायनासोर) संसार का सबसे
शक्तिशाली प्राणी था और अब दूसरी ओर
यह (मानव) है जो संसार का सबसे बुद्धिमान
प्राणी है। क्या मनुष्य कुदरत के इस
विनाशी चक्र को रोक पाएगा?
यदि प्राकृतिक आपदाओं को छोड़कर अभी तक
का इतिहास देखें तो मानव जाति कई बार
विषम परिस्थितियों में से बाहर निकलकर
आई है और अपने वजूद को अक्षुण्ण रखा है परन्तु आगे
की कहानी कुछ अलग है।
जलवायु परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस
अनंत ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं। सूर्य में
लगातार हो रहे परिवर्तनों से
पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन
होना स्वाभाविक है, परन्तु यह परिवर्तन
बहुत मद्धिम है। प्राकृतिक परिवर्तन की वज़ह
से हुआ जलवायु परिवर्तन
इतना धीमा होता है कि इसका अंतर देखने के
लिए पीढ़ियाँ निकल जाती हैं।
प्रकृति की यह भी व्यवस्था है कि इस
परिवर्तन के साथ प्राणियों के शरीर
भी नई जलवायु के अनुकूल ढलते जाते हैं।
इस तरह विधाता की यह दुनिया गतिमान
रहती है। जो इतने छोटे परिवर्तन को भी झेल
नहीं पाते वे लुप्त होते जाते हैं। मनुष्य
का शरीर इन्हीं परिवर्तनों को झेलते हुए आज
इस आधुनिक रूप में है जो सामने है किन्तु अब ऐसे
कौन से कारण हैं जिनसे मनुष्य पर विलुप्त होने
का खतरा मंडरा रहा है?
मनुष्य की बुद्धिमानी का असर यूँ हुआ कि उसने
अपनी सुविधा के लिए कई
आविष्कारों को जन्म दिया। फिर इन
सुविधाओं को भोगने के लिए प्रकृति के दोहन
का सिससिला आरम्भ हुआ और साथ ही प्रदूषण
का। इस प्रदूषण ने जलवायु बदलने
की गति को अत्यधिक तेज़ कर दिया है।
बीजिंग की हवा अपनी सुरक्षित सीमा से
चालीस गुना जहरीली हो चुकी है।
दिल्ली भी पीछे नहीं है। पिछले
दिनों दिल्ली लगभग एक महीने तक कोहरे में
ढकी रही। वैज्ञानिकों के अनुसार यह केवल
कोहरा नहीं था। यह धुंए (स्मोक) और कोहरे
(फॉग) का मिश्रण था, जिसे नया नाम
दिया गया है स्मॉग। यह स्मॉग साँस लेने में
रुकावट पैदा करता है और
फेफड़ों की बीमारियों का कारण
बनता है। पर्यावरण की उपेक्षा आज और भी कई
मुसीबतों को जन्म दे रही है, जिनमें प्रमुख हैं
दावानल, चक्रवात, अतिवृष्टि,
अनावृष्टि इत्यादि। यदि यहाँ से बच
भी जाएँ तो दुनिया 6000 से
ज्यादा परमाणु हथियारों के जखीरे पर
बैठी है। इस जखीरे में इतनी शक्ति है कि यह
पृथ्वी को कई बार मानवरहित कर सकता है।
आज न तो मनुष्य के पास सोचने के लिए समय है
और न ही उसकी देह में इतनी क्षमता जो इस
तेजी से बदलते पर्यावरण के अनुरूप अपने आप
को ढाल ले। पंच तत्वों (वायु, जल, आकाश,
मिट्टी और अग्नि) से बने इंसान ने अपने
पाँचों तत्वों को दूषित कर दिया है।
तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस शाख पर
बैठा है, उसे ही काट रहा है। जिस पेड़ के फल
भोगता है, उसी की जड़ें खोद रहा है।
भौतिक विकास के नाम पर मानव भागे
जा रहा है विनाश के मार्ग पर। इस दौड़ में
हम सब शामिल हैं।
वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं पर उनकी आवाज़
नक्कार खाने में तूती की आवाज़ से
ज्यादा कुछ नहीं। प्रकृति संकेत देती है, जिसे
हम समझने को तैयार
नहीं या समझना नहीं चाहते। हम अपने
विनाश की पटकथा स्वयं लिख रहे हैं। जिस
दिन मानव समाज की आँखें खुलेंगी तब तक
ऐसा न हो कि लौटने के लिए बहुत देर
चुकी हो। अतः आवश्यक है
कि मानवजाति अपने बुने इस
विनाशकारी आत्मघाती मायाजाल से
बाहर निकले, यथार्थ का संज्ञान ले,
पर्यावरण को एक धरोहर समझकर सहेजें और आने
वाली पीढ़ी को इसे एक सुरक्षित विरासत
में सौपें।y
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manjeet kaur

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